Category: Poem



The skin felt the heat first
but the first to burn was the hair.
First the hair behind the palms,
and then the ones on the arms,
then those on the leg
and then
the ones on the head.

Hair do not burn as if on fire.
They just shorten in length,
slowly,
because of the heat.
Once the hair are gone,
the skin starts burning.
It is the skin
on the back first
because I am lying,
face up.

There is no feeling on the back
till the heat touches the bone.
That happens first
before the skin of the arms is
burnt.
The heat touches the heel bone
before it touches the nail of the toe.

The muscles of the hind burn first
before the heat takes the scalp.
A few vertebra dislocate
as the joining tendons burn.

The waist goes next
and then the chest.
The organs go first
before the enclosing bones.

The eyes melt first
before the cheeks are gone.
The tongue burns first
before the skull cracks.

The heat shrinks the brain
before the knees crack.
The chest collapses
before the skull breaks.
The brain is burnt
before the last bone dislocates.

The body does not react to all this,
because it is dead.
What I write is an experience
that none can express.

It is the mind that watches
the movement of time.
It is time that passes,
not ‘us’ passing time.

It is the mind that told
my son to write.
I know this will give
a tear to his eye.
He stood with me
on that day,
so I stand with him
on this day,
to express what all must feel,
but none can express.
An experience of a
lifetime!
-देवसुत

Photo By:
Submitted by: देवसुत
Submitted on: Sun May 17 2015 21:34:10 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: English

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ಅಮ್ಮ, ಶಾಲೆಗೆ ನಾಳೆ ಹೋಗುವೆ
ಇಂದು ಮಳೆಯೊಡನೆ ಆಡಬೇಕು
ಪುಟ್ಟ ಕಾಗದದ ದೋಣಿಗಳಿವೆ
ಅವು ತೇಲುವುದನ್ನು ನೋಡಬೇಕು
ಚಪ್ಪಾಳೆ ತಟ್ಟಿ ಕುಣಿಯಬೇಕು

ಅಮ್ಮ, ಶಾಲೆಗೆ ನಾಳೆ ಹೋಗುವೆ
ಇಂದು ಹಸಿರು ಗದ್ದೆಯಲ್ಲಿ ಓಡಬೇಕು
ಕೆಸರಿನಲಿ ಬಿದ್ದು ಉರುಳಾಡಬೇಕು
ಬಣ್ಣ ಬಣ್ಣದ ಪಾತರಗಿತ್ತಿಗಳಿವೆ
ಅವು ಹಾರುವುದನ್ನು ನೋಡಬೇಕು

ಅಮ್ಮ, ಶಾಲೆಗೆ ನಾಳೆ ಹೋಗುವೆ
ಇಂದು ತೋಟದಲ್ಲಿ ಆಡಬೇಕು
ಮರಗಳ ಜೊತೆ ಗೆಳೆತನ ಬೆಳೆಸಬೇಕು
ರುಚಿರುಚಿಯಾದ ಹಣ್ಣುಗಳಿವೆ
ಅವುಗಳ ಸವಿಯನ್ನು ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಹಂಚಬೇಕು

ಅಮ್ಮ, ಶಾಲೆಗೆ ಹೋಗಲೇ ಬೇಕೇ?
ಶಾಲೆಗೆ ಹೋಗುವುದಿಲ್ಲವಲ್ಲ ಆಡು-ಮೇಕೆ
ನಿಸರ್ಗವೇ ಹೇಳಿಕೊಡುವುದು ಪಾಠ
ಕಲಿಕೆಯ ಜೊತೆಯಲ್ಲೇ ಸಾಗುವುದು ನನ್ನ ಆಟ
ಅಮ್ಮ, ಇನ್ನು ಬೇಡವೇ ಬೇಡ ಶಾಲೆಯ ಕಾಟ!

-Madhubala

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Submitted by: Madhubala
Submitted on: Mon Jan 21 2019 12:53:50 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: ಕನ್ನಡ/Kannada

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puranapanda_srinivas-_1_.jpg
जीवन – यज्ञ है
जब ,
मैं – नहीं है
और सब – मैं है
तब ,
जीवन – यज्ञ है |

कैसे , कब , क्या, कहाँ – सब ,
सीखो जब
और
“मैंने किया” ,
मत बोलो
तब ,
जीवन – यज्ञ है |

इस राह पर पहला कदम
जब बोलो – सब साथ चलो ,
और चलो – सबको साथ
लेकर ,
खींचकर ,
पसीना तर हो जाओ ,
पर बोलो – मैं नहीं ,
तब ,
पथ तुम्हारा यज्ञ है ,
तब ,
जीवन – यज्ञ है |

सबके आंसू पोंछो ,
पर बोलो – मैं नहीं ,
सबकी भूख मिटाओ ,
पर बोलो – मैं नहीं ,
तब
जीवन – यज्ञ है |

भलों की करो भलाई ,
पर बोलो – मैं नहीं ,
बुरों की करो बुराई ,
और बोलो – सिर्फ – मैं ,
तब
जीवन – यज्ञ है |

-देवसुत

Photo By: Unknown
Submitted by: देवसुत
Submitted on: Mon Nov 19 2018 23:27:00 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi

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बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

Photo By: Unknown
Submitted by: Atal Behari Vajpayee
Submitted on: 16-Aug-2018
Category: Non-Original work with acknowledgements
Language: हिन्दी/Hindi

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ಪಿಸುಮಾತು -Aa.Ja.Ka


ಮನಸಿಗೇಕೆ ತಾಕಿತು ನಿನ್ನ ಮೌನದ ಮಾತಿನ ಅರ್ಥ ?
ಮನದಿಯಲ್ಲೇಕೆ ಉಳಿಯಿತು ನೀನೇ ಬೇಕೆಂಬ ಸ್ವಾರ್ಥ ?
ಶಾಶ್ವತವಾಗಿ ನಿನ್ನನ್ನು ಮನದ ಮರೆಗೆ ನೂಕುವಾಗ ನೀ ಏಕೆ ಜಿಗಿದೆ ಮನದ ಮೋಡಕ್ಕೆ
ನನ್ನನ್ನು ನನ್ನಿಂದಲೇ ಎಳೆದು ಏಕೆ ನೂಕಿದೆ ಪ್ರೀತಿಯ ಮಾರ್ಗಕ್ಕೆ ?

Photo By:
Submitted by: Aa.Ja.Ka
Submitted on: Thu Apr 19 2018 23:23:24 GMT+0530 (IST)
Category: Semi-Fiction-A real life incident mixed with imagination Language: ಕನ್ನಡ/Kannada

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दोहा :

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

चौपाई :

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।

रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।

कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै।

संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन।।

विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।

भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।

लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना।।

जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।

दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना।।

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।

संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।

और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै।।

चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।

साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।

राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।

अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।

संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई।।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।

दोहा :

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

Photo By:
Submitted by: Tulsidas
Submitted on:
Category: Folklore
Language: हिन्दी/Hindi

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ಕನಸು ಕಾಣುವುದು ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಇಷ್ಟ .
ಆದರೆ ನನಸಾಗಲು , ಪಡಬೇಕು ಸ್ವಲ್ಪ ಕಷ್ಟ .
ಇದ್ದರೆ ನಿನ್ನಲ್ಲಿ ವಿಚಾರಗಳು ಸ್ಪಷ್ಟ ,
ಆಗದು ನಿನ್ನ ಶ್ರಮ ಎoದಿಗೂ ನಷ್ಟ .

ಒದಗಿ ಬರಬೇಕೆಂದರೆ ನಿನಗೆ ಅದೃಷ್ಟ ,
ತ್ಯಜಿಸು ಎಲ್ಲ ದುಶ್ಚಟ , ಮಾಡು ಕೆಲಸ ವಿಶಿಷ್ಟ ,
ಪಡಿಸು ಹಿರಿಯರನು ಸಂತುಷ್ಟ .
ನೆರವಾಗು ಜನರಿಗೆ ತೊರೆಯಲು ಸಂಕಷ್ಟ .

ಚಂಚಲ ಮನಸನು ಚೂಟಿ ಹಾಕಿ
ಉಹಾಪೋಹಗಳಿಗೆ ಕಿವಿಗೊಡದೆ
ನಿರರ್ಗಳವಾಗಿ ನಿರ್ಭಯದಿಂದ ಮುನ್ನುಗ್ಗು,
ನಿನ್ನ ನಡೆನುಡಿಯಲ್ಲಿದ್ದರೆ ಶಿಷ್ಟ ,
ಈ ಜಗದಲಿ ನೀನಾಗುವೆ ಉತ್ಕೃಷ್ಟ ..

ಹೌದು , ಕನಸು ಕಾಣುವುದು ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಇಷ್ಟ .
ನನಸಾಗಬೇಕೆಂದರೆ ಸ್ವಲ್ಪ ಕಷ್ಟ . . ಸ್ವಲ್ಪ ಕಷ್ಟ . .
-Shilpa Manjunath

Photo By:
Submitted by: Shilpa Manjunath
Submitted on: Mon Jun 19 2017 03:27:38 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: ಕನ್ನಡ/Kannada

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Droplets -jasnoor kaur


Un shed, quiet, silent, sorrowful.
Full of dejection, fear and anticipation.
Un shed ,quiet ,silent,sorrowful
Full of dejection, fear and anticipation
often, just drops of water ….
for the onlookers.
Agony and helplessness
gives them shape,
Shattered dreams, lost friends
Out of happiness …do they appear?
I’ve only heard…Never felt
Oh…! I’m talking about tears
-jasnoor kaur

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Submitted by: jasnoor kaur
Submitted on: Mon Jul 10 2017 14:49:27 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: English

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ಭುಜಕ್ಕೆ ಕಿಟಕಿಯ ಆಸರೆ. ಮನದ ತುಮುಲಕ್ಕೆ ಪದಗಳ ಆಸರೆ
ಎಂದೋ ಪ್ರಾರಂಭವಾದ ಹಾಡಿಗೆ ಪಲ್ಲವಿಯ ಆಸರೆ
ಎಂದೋ ಮುಗಿಯುವ ಹಾಡಿಗೆ ಕಾಲನ ಆಸರೆ
ಕ್ಷಣಿಕ ಸ್ವಾತಂತ್ರ್ಯಕ್ಕೆ ಸ್ವರಗಳ ಆಸರೆ.

ಸೂರೆ ಹೋದ ಪಟ್ಟಣದ ದಂತಕಥೆಯಂತೆ
ಹಿಡಿಯಷ್ಟು ಜೀವ… ಮುಡಿದಷ್ಟು ನಲಿವು
ಮೃದಂಗದ ತಕಧಿಮಿಯಲ್ಲಿ ನಿನ್ನ ಉಸಿರಿನ ನೆರಳು
ಕಂಡೂ ಕಾಣದಂತೆ ತಾಳ ತಪ್ಪುವ ಬೆರಳುಗಳು .

ಯಾಕೆ ಬರಲಿಲ್ಲ ಮತ್ತೆ ಆ ದಿನ ಎಂಬ ಆಕ್ಷೇಪ
ಥಟ್ಟನೆ ಎದ್ದ ಸಣ್ಣ ಅಪಸ್ವರಕೆ ನವಿರಾದ ಎಚ್ಚರಿಕೆ
ಧ್ವನಿಯ ಕಂಪನ ಇಂದಿಗೂ ಗುಪ್ತಗಾಮಿನಿ
ಅಲ್ಲಿರಲಿ ಅದು ರಾಗಕ್ಕೆ ನಿಲುಕದ ಭಾವವಾಗಿ.

ಕನಸಿನಂತೆ ಕಳೆದು ಹೋದ ಆ ಮುಸ್ಸಂಜೆಯ ಛಾಯೆ
ಮರುಭೂಮಿಯಲ್ಲಿ ಚಿಗುರಿದ ಜೀವಸೆಲೆ
ಇನ್ನೆಲ್ಲಿ ಅಲೆಮಾರಿ ಬದುಕು ಸಾಕು ಬಿಡು ಹುಡುಕಾಟ
ಅತ್ತಿತ್ತ ಪರದಾಡದಿರು ನೀನಿರುವಲ್ಲೇ ಸುಮುಧುರ ಗಾನ.

ನೀರಲ್ಲಿ ಮೀನಿನ ಹೆಜ್ಜೆ ಕಂಡವರುಂಟೇ
ಕಾಡು ವನದಲ್ಲಿ ಜೋಗಿಯ ಜಾಡು ಹಿಡಿದವರುಂಟೇ
ನಿನ್ನೆಯ ಹಾಡುಗಳು ಕನ್ನಡಿಯೊಳಗಿನ ಗಂಟು
ಅಳಿಸಿ ಹೋದ ಪದಗಳು… ಹಾಳು ಮರೆವು.

-Daya Bhat

Photo By:
Submitted by: Daya Bhat
Submitted on: Tue May 02 2017 13:53:02 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: ಕನ್ನಡ/Kannada

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The Hollow Leaves
Spread out upon the ground,
Out of mere sadness there’s a tug at the heart
To light the spark of what were looking for
The twilight sun has tainted our vision
Through the trees, a nature’s release
In spreading the disease.
We spent a lifetime in harmony
Out of mere sadness and tragedy
A beautiful union to believe
To have faith, a willing to achieve
The hollow leaves were blowing in the breeze.
Illumination in its timeless radiance
A sprinkling array of blissful care
None the worse for wear
We each can listen to the inner sound of our soul
A grand sparkling array of vast filled radiance abounds.
-hitalot

Photo By:
Submitted by: hitalot
Submitted on: Thu May 25 2017 06:31:03 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: English

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