भविष्य का भय हो, या भूत का भूत
डरते हैं सभी, सपूत और कपूत .
पर समय तो पानी है, रोके नहीं रुकता , हवा है बंधे नहीं बंधता,
समय तो है मूर्खों के पास धन, कब खर्च हो पता नहीं लगता .
घड़े से पानी बूँद-बूँद कर रिसॆ, तब ही पता लगाओ तुम,
शिव को करो अर्पण या प्यासे की प्यास बुझाओ तुम .
क्यों जीते हो, कभी सोचा – देखा है ?
क्या धन दौलत, ऐश्वर्य , यही हमारी सीमा रेखा है ?
– -amalik

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Submitted by: amalik
Submitted on: Sat Oct 05 2013 03:08:17 GMT+0530 (IST)
Category: Original
Language: हिन्दी/Hindi
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